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कहावतें एवं लोकोक्तियाँ

हिन्दी कहावतें एवं लोकोक्तियाँ

सामान्य परिचय – लोकोक्तियों को कहावत भी कहते है । ‘ कहावत ‘ शब्द कथावत से बना है क्योंकि इनका प्रचलन किसी कथा या कहानी में निहित सत्य के आधार पर हुआ है । इनका प्रयोग वाक्य को अधिक युक्तिसंगत , प्रभावशाली एवं प्रमाणित बना देता है । कहावत लोक में सूत्र के रूप में प्रचलित रहती है । इसी कारण वह लोक की उक्ति अथवा लोकोक्ति कही जाती है ।
मुहावरा और लोकोक्ति का प्रयोग एवं प्रभाव बहुत समान होते है । इस कारण अनेक व्यक्ति इन दोनों के मध्य अंतर नहीं कर पाते है और एक के स्थान पर दूसरे का प्रयोग कर देते है ।

मुहावरा और कहावत (लोकोक्ति) के मध्य मुख्य अंतर यह होता है की मुहावरा किसी वाक्य का अंश होता है और अलग से उसका कोई विशेष अर्थ नहीं होता है अर्थात मुहावरा वाक्य में रहकर ही अपने अर्थ के चमत्कार को प्रकट करता है किन्तु लोकोक्ति स्वत: पूर्ण रहती है और वह अलग से भी अपने साथ विशेष अर्थ अथवा संकेत को वहन करती है ।

मुहावरे शब्दों के लाक्षणिक प्रयोग है किन्तु कहावते किसी कहानी अथवा चिरंतन सत्य से सम्बंधित हुआ करती है । इनका प्रयोग विषय को स्पष्ट करने के लिए किया जाता है । मुहावरा केवल चमत्कार उत्पन्न करने के लिए किया जाता है ।

सारांश रूप से कहावतें लोकोक्तयों का स्वतंत्र फल होता है । ये साधन और साध्य दोनों होती है । परन्तु मुहावरे केवल कथन की शैली के रूप में होते हैं।



कुछ प्रचलित लोकोक्तियाँ

                    लोकोक्ति ———————- अर्थ

आप भला तो जग भला ——————— अच्छे को सभी अच्छे लगते हैं।

आटे के साथ घुन भी पिसता है ————- आपराधी के साथ निरपराध भी दंडित होता है।

उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे  ————– स्वयं दोषी होकर निर्दोष को दोषी ठहराना

उंगली पकड़ कर पोंछा पकड़ना  ———- थोड़ा सहारा पाकर पूरे पर दावा जमाना

ऊँट दूल्हा पुरोहित गधा  ——————– एक मूर्ख व्यक्ति द्वारा दूसरे मूर्ख की प्रशंसा

ऊँची दुकान, फीका पकवान  ————– केवल बाहरी चमक-दमक, भीतर खोखलापन

ऊँट किस करवट बैठता है  —————– लाभ किस पक्ष का होता है।

ऊधो की पगड़ी माधो के सिर  ————– एक का दोष दूसरे के सिर मढ़ना

एक तन्दुरुस्ती हजार नियामत  ————- स्वास्थ्य बहुत बड़ी चीज है।

एक अनार सौ बीमार  ———————- किसी वस्तु की पूर्ति कम किन्तु माँग अधिक होना

एक तवे की रोटी, क्या छोटी क्या मोटी  —- सब लगभग एक समान होना

ओछे की प्रीत बालू की भीत  —————- क्षुद्र व्यक्तियों की मित्रता स्थायी नहीं होती

कौआ भी हाड़ न ले जाएगा  —————- दूर रहने वालों की कोई खबर भी नहीं लेता

कभी नाव गाड़ी पर कभी गाड़ी नाव पर —- एक दूसरे की सहायता लेनी ही पड़ती है।

कंगाली में आटा गीला होना  —————- मुसीबत पर और मुसीबत का आना

कहने से कुम्हार गधे पर नहीं चढ़ता  ——– हठी मनुष्य किसी का कहना नहीं मानता

खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है – पड़ोस का असर पड़ता है।

गधा खेत खाए जुलाहा पीटा जाए  ———– किसी के कर्म की सजा अन्य को मिले

घड़ी में तोला घड़ी में माशा  —————— जरा-सी बात पर खुश और नाराज होना

घर की मुर्गी दाल बराबर  ——————– हस्तगत चीज का विशेष मूल्य नहीं होता

घर का भेदी लंका ढाए ———————- आपसी वैमनस्य से बड़ी हानि होती है।

चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए  ————– मर जाए पर पैसा न जाए

चोर के पैर नहीं होते  ———————— अपराधी स्वयं भयभीत रहता है

चौबे गए छब्बे बनने, दूबे ही रह गए ——— लाभ के स्थान पर हानि होना

चलती का नाम गाड़ी है  ——————— जिसे सफलता मिले उसी का यश फैले

जैसी करनी, वैसी भरनी  ——————– कार्य के अनुसार परिणाम मिलता है।

जल में रहकर मगर से बैर  —————— आश्रयदाता को शत्रु नहीं बनाया जा सकता।

जर का जोर पूरा है और सब अधूरा है  ——  धन में सब कार्य सिद्ध करने की शक्ति है ।

जैसा देश वैसा भेष  ————————- जहाँ रहो, वहाँ वैसी रीति पर चलो ।

टट्टी की ओट शिकार खेलना  ————— छिपकर दूसरों को धोखा देना।

तीन लोक ते मथुरा न्यारी  ——————- सबसे अलग विचार करना

तेली का तेल जले मसालची का दिल जले — एक को खर्च करते देख दूसरा परेशान

तबेले की बला बन्दर के सिर  —————- किसी का अपराध दूसरे के सिर मढ़ना

तेते पाँव पसारिये जेती लम्बी सौर  ———– अपने सामर्थ्य के अनुसार काम करना ।

थोथा चना बाजे घना  ———————— ज्ञान कम दिखावा अधिक

दस जने की लाठी एक जने का बोझ  ——- सहयोग से काम आसानी से हो जाना।

दोनों हाथों में लड्डु  ————————– सब ओर लाभ ही लाभ होना ।

दाल-भात में मूसलचन्द  ——————– अनावश्यक दखल देना ।

दूर के ढोल सुहावने  ———————— दूर से अच्छी लगने वाली वस्तु ।

दूसरे की पत्तल लम्बा-लम्बा भात  ———- पराई वस्तु सदा अच्छी लगती है ।

दूध का दूध पानी का पानी  —————- निरपेक्ष न्याय करना ।

धोबी का कुत्ता, घर का न घाट का  ——– निकृष्ट किसी का या कहीं का पात्र नहीं होता।

नेकी कर दरिया में डाल  ——————- किसी पर उपकार करके भूल जाना चाहिए।

नौ की लकडी, नब्बे खर्च  —————— कम लाभ, अधिक खर्च ।

न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी  ———— किसी बात के कारण चीज को ही जड़ से मिटा देना ।

नौ नगद न तेरह उधार  ——————— उधार से नकद थोड़ा भी मिलना अच्छा है।

नंगा क्या धोये क्या निचोड़े  —————– निर्धन कुछ नहीं कर सकता

नाच न जाने आँगन टेढ़ा ——————– अपनी अकुशलता का दोष दूसरों पर डालना

पिया चाहे सो सुहागिन ——————— चाहने वाले की इच्छा सर्वोपरि हे

पढ़े फारसी बेचे तेल ———————— विवश होकर योग्यता से निम्न स्तर का कार्य करना

बगल में छोरा नगर में ढिंढोरा ————– वस्तु के पास होने पर भी उसे चारों ओर ढूँढना

बोए पेड़ बबूल का आम कहाँ से होए ——- बुरे काम का फल अच्छा नहीं हो सकता

बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी ——– विनाश करने वाले का विनाश निश्चित है।

बंदर की आशनाई घर में आग लगाई  —— मूर्ख से मित्रता करने पर हानि होती है।

बिल्ली के गले में घंटी ———————– कठिन काम संपन्न करना

बिन माँगे मोती मिले माँगे मिले न भीख —- माँगना अच्छा नहीं

भुस में आग लगाकर जमालों दूर खड़ी —– कलह का बीज बोकर तटस्थ रहना

मियाँ की दौड़ मस्जिद तक —————– जिसका आना-जाना सीमित क्षेत्र तक हो

मुँह में राम बगल में छुरी ——————– कपटपूर्ण व्यवहार

मुर्द सुस्त गवाह चुस्त  ———————– जिसका काम हो वह सुस्त हो दूसरे अधिक सक्रिय

यथा राजा तथा प्रजा  ———————— स्वामी के अनुसार ही सेवक होते है।

राम की माया कहीं धूप कहीं छाया  ——— ईश्वर की इच्छानुसार सुख-दु:ख सर्वत्र हे

रस्सी जल गई पर ऐंठन नहीं गई  ———– बरबाद हो जाने पर भी अहंकार बना रहना

लेना एक न देना दो ————————- किसी से कोई मतलब नहीं







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