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रस का परिचय

रस की परिभाषा : सबसे पहले भरत मुनि ने रस का उल्लेख अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘ नाट्यशास्त्र’ में ईसा की पहली शताब्दी के आसपास किया था । उनके अनुसार विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव के संयोग से रस की निष्पति होती है । उक्त सूत्र के व्याख्याकार अभिनवगुप्त के आधार पर ‘काव्यप्रकाश’ के रचयिता मम्मभट्ट ने कहा है कि आलम्बन विभाग से उदबुद्ध, उद्दीपन से उद्दीप्त, व्यभिचारी भावों से परिपुष्ट तथा अनुभाव द्वारा व्यक्त हृदय का ‘ स्थायीभाव’ ही रस-दशा को प्राप्त होता है ।



उदाहरण- राम पुष्पवाटिका में घूम रहे है । एक और से जानकीजी आती है । एकान्त है और प्रात: कालीन वायु । पुष्पों की छटा मन में मोह पैदा करती है । राम इस दशा में जानकी जी पर मुग्ध होकर उनकी ओर आकृष्ट होते है । राम को जानकीजी की ओर देखने से इच्छा और फिर लज्जा से हर्ष और रोमांच आदि होते है । इन सारे वर्णन को सुन-पढ़कर श्रोता-पाठक के मन में ‘रति’ जागरित होती है । यहाँ जानकीजी ‘आलम्बनविभाव’, एकान्त तथा प्रात:कालीन वाटिका का दृश्य ‘उद्दीपनविभाव’ सीता और राम में कटाक्ष-हर्ष-लज्जा-रोमांच आदि ‘व्यभिचारीभाव’ हैं, जो सब मिलकर ‘स्थायी भाव’ ‘ रति’ को उत्पन्न कर ‘श्रृंगार रस’ का संचार करते हैं।

 

उपर्युक्त परिभाषा और व्याख्या में कई पारिभाषिक शब्द आए हैं जो रस के चार तत्त्व है । जैसे–(1) विभाव, (2) अनुभाव, (3) व्यभिचारी भाव और (4) स्थायी भाव ।

1. विभाव – जो व्यक्ति, पदार्थ अथवा बाह्य विकार अन्य व्यक्ति के हृदय में भावोद्रेक करता है, उन कारणों को ‘विभाव’ कहते है । इन कारणों के भेद से विभाव के दो भेद हैं(क) आलम्बनविभाव और (ख) उद्दीपनविभाव । उदाहरण- पुष्पवाटिका में राम और जानकी घूम रहे हैं। जानकी के साथ उनकी सखियाँ है और राम के साथ लक्ष्मण । यहाँ जानकी के हृदय में जागरित ‘रतिभाव’ (स्थायीभाव ) के ‘आलम्बनविभाव’ हैं – राम। जानकी की सखियाँ, जो उन्हें राम के दर्शन में सहायता पहुँचा रही हैं, उद्दीपनविभाव हैं।

2. अनुभाव – आलम्बन और उद्दीपन विभावों के कारण उत्पन्न भावों को बाहर प्रकाशित करने वाले कार्य ‘अनुभाव’ कहलाते हैं। उपर्युक्त प्रसंग में राम के दर्शन से सीता का चकित होना ‘अनुभाव’ है । यहाँ राम सीता के अनुभावों के ‘आश्रय’ हो सकते है और सीता के अनुभावों की । अर्थात हृदय से संचित रति आदि ‘स्थायी भावों’ का कार्य, मन और वचन की चेष्टा के रूप में प्रकट होना ही ‘अनिभाव’ है । अत: अनुभाव के चार भेद हैं–(क) कायिक , (ख) मानसिक (ग) वाचिक और (घ) आहार्य । यों इसके अन्य भेद भी हैं।

3. व्यभिचारी या संचारी भाव – व्यभिचारी या संचारी भाव ‘स्थायी भाव’ के सहायक हैं, जो अनुकूल परिस्थितियों में घटते-बढ़ते हैं। इन भावों के वर्गीकरण के चार सिद्धांत माने जाते हैं –i) देश, काल और अवस्था , ii) उत्तम, माध्यम और अधम प्रकृति के लोग, iii) आश्रय की अपनी प्रकृति या अन्य व्यक्तियों की उत्तेजना के कारण अथवा वातावरण के प्रभाव, iv) स्त्री और पुरुष के अपने स्वाभाव के भेद। जैसे – निर्वेद, शंका और आलस्य आदि स्त्रियों या नीच पुरुषों के संचारी भाव हैं: गर्व आत्मगत संचारी है; अमर्ष परगट संचारी: आवेग या त्रास कालानुसार संचारी है । संचारी भावों की संख्या 33 हैं; जैसे – निर्वेद, ग्लानि, शंका. असूया, मद, दीनता इत्यादि ।

4. स्थायी भाव- मन का विकार ‘भाव’ है । भरत मुनि ने अपने ‘नाट्यशास्त्र’ में भावों की संख्या उनचास कहीं है, जिसमे तैंतीस संचारी या व्यभिचारी , आठ सात्त्विक और शेष आठ ‘स्थायी भाव’ हैं ।

 

हिंदी में ‘स्थायी भाव’ के आधार पर भरत मुनि के अनुसार काव्य में रस निम्नलिखित नौ प्रकार के होते हैं–

रस —–स्थायीभाव
1. श्रृंगार रस –रति
2. हास्य रस –हास
3. करुण रस –शोक
4. रौद रस–क्रोध
5. वीर रस – उत्साह
6. भयानक रस – भय
7. वीभत्स रस-जुगुप्सा
8. अदभुत रस–विस्मय
9. शान्त रस – शम अथवा निर्वेद

बाद के आचार्यों ने भक्ति और वात्सल्य को भी स्थायी भाव माना है ।







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