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वायुमंडल General knowledge

▬ पृथ्वी को चारों से घेरे हुए वायु के विस्तृत फैलाव को वायुमंडल (Atmosphere) कहते है। वायुमंडल की ऊपरी परत के अध्ययन को वायुर्विज्ञान (Aerology) और निचला अध्ययन को ऋतु विज्ञान (Meterology) कहते हैं।

▬ आयतन के अनुसार वायुमंडल में (तीस मील के अन्दर) विभिन्न गैसों का मिश्रण इस प्रकार है – नाइट्रोजन 78.07%, ऑक्सीजन 20.93%, कार्बन-डाइ-आक्स .03% आर्गन 0.93%।

वायुमंडल में पाये जाने वाले कुछ महत्वपूर्ण गैस



1. नाइट्रोजन: इस गैस की प्रतिशत मात्रा सभी गैसों से अधिक है| नाइट्रोजन की उपस्थिति के कारण ही वायुदाब, पवनों की शक्ति तथा प्रकाश के परावर्तन का आभास होता है। इस गैस का कोई रंग, गंध अथवा स्वाद नहीं होता। नाइट्रोजन का का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह वस्तुओं को तेजी से जलने से बचाती है। यदि वायुमंडल में नाइट्रोजन न होती तो आग पर नियन्त्रण रखना कठिन हो जाता। नाइट्रोजन से पेड़-पौधों में प्रोटीनों का निर्माण होता है, जो भोजन का मुख्य अंग है। यह गैस वायुमंडल में 128 किलोमीटर की ऊँचाई तक फैली हुई।

2. ऑक्सीजन: यह अन्य पदार्थो के साथ मिलकर जलने का कार्य करती है। ऑक्सीजन के अभाव में हम इंधन नहीं जला सकते। अतः यह ऊर्जा का मख्य स्रोत है। यह गैस वायुमंडल में 64 किलोमीटर की ऊँचाई तक फैली हुई है, परन्तु 16 किलोमीटर से ऊपर जाकर इसकी मात्रा बहुत कम हो जाती है।

3. कार्बन-डाई-ऑक्साइड: यह सबसे भारी गैस है और इस कारण यह सबसे निचली परत में मिलती है फिर भी इसका विस्तार 32 किमी की ऊँचाई तक है। यह गैस सूर्य से आने वाली विकिरण के लिए पारगम्य तथा पृथ्वी से परावर्तित होने वाले विकिरण के लिए अपारगम्य है। अतः यह काँच घर या पौधा घर (Green house) प्रभाव के लिए उत्तरदायी है और वायुमंडल के निचली परत को गर्म रखती है।

4. ओजोन: यह गैस ऑक्सीजन का ही एक विशेष रूप है। यह वायुमंडल में अधिक ऊँचाइयों पर ही अति न्यून मात्रा में मिलती है। यह सूर्य से आने वाली तेज पराबैंगनी विकिरण (Ultraviolet Radiations) के कुछ अंश को अवशोषित कर लेती है। यह 10 से 50 किमी की ऊँचाई तक केन्द्रित है। वायुमंडल में ओजोन गैस की मात्रा में कमी होने से सूर्य की पराबैंगनी विकरण अधिक मात्रा में पृथ्वी पर पहुँच कर कैंसर जैसी भयानक बीमारियों फैला सकती है।

▬ गैसों के अतिरिक्त वायुमंडल में जलवाष्म तथा धूल के कण भी उपस्थित हैं।

▬ आकाश का रंग नीला धूल कण के कारण ही दिखाई देता है।

▬ जलवाष्प सूर्य से आने वाले सूर्यातप के कुछ भाग को अवशोषित कर लेता है तथा पृथ्वी द्वारा विकिरित ऊष्मा को संजोए रखता है। इस प्रकार यह एक कंबल का काम करता है, जिससे पृथ्वी न तो अत्यधिक गर्म और न ही अत्यधिक ठण्डी हो सकती है। जलवाष्प के संघनन से वृष्टि होती है।

▬ वायुमंडल में जलवाष्प सबसे अधिक परिवर्तनशील तथा असमान वितरण वाली गैस है।

▬ पृथ्वी के ताप को बनाए रखने के लिए उत्तरदायी है-CO2 एवं जलवाष्प ।

वायुमंडल की संरचना

▬ वायुमंडल को निम्न परतों में बाँटा गया है – 1.क्षोभ मंडल (Troposphere) 2. समताप मंडल (Stratosphere) 3. ओजोन मंडल (Ozonosphere) 4. आयन मंडल (lonosphere) और 5. बहिर्मडल (Exosphere)

1. क्षोभ मंडल (Troposphere)

▬ यह वायुमंडल की सबसे नीचे वाली परत है।

▬ इसकी ऊँचाई ध्रुवों पर 8 किमी तथा विषुवत रेखा पर लगभग 18 किमी होती है।

▬ क्षोभ मंडल में तापमान की गिरावट की दर प्रति 165 मी० की ऊँचाई पर 1°C अथवा 1 किमी की ऊँचाई पर 6.4°C होती है।

▬ सभी मुख्य वायुमंडलीय घटनाएँ जैसे बादल, आँधी एवं वर्षा इसी मंडल में होती हैं।

▬ इस मंडल को संवहन मंडल कहते हैं, क्योंकि संबहन धाराएँ इसी मंडल की सीमा तक सीमित होती हैं। इस मंडल को अधो मंडल भी कहते है।

2. समताप मंडल (Stratosphere)

▬ समताप मंडल 18 से 32 किमी की ऊँचाई तक है। इसमें ताप समान रहता है।

▬ इसमें मौसमी घटनाएँ जैसे ऑधी, बादलों की गरज, बिजली कड़क, धूल कण एवं जलवाष्प आदि कुछ नहीं होती हैं।

▬ इस मंडल में वायुयान उड़ाने की आदर्श दशा पायी जाती है।

▬ समताप मंडल की मोटाई ध्रुवों पर सबसे अधिक होती है, कभी-कभी विषुवत् रेखा पर इसका लोप हो जाता है।

▬ कभी-कभी इस मंडल में विशेष प्रकार के मेघों का निर्माण होता है, जिन्हें मूलाम मेघ (Mother of pearl cloud) कहते हैं।

3. ओजोन मंडल (Ozonosphere)

▬ धरातल से 32 किमी से 60 किमी के मध्य ओजोन मंडल है।

▬ इस मंडल में ओजोन गैस की एक परत पायी जाती है, जो सूर्य से आने वाली पराबैंगनी किरणों को अवशोषित कर लेती है। इसीलिए इसे पृथ्वी का सुरक्षा कवच कहते हैं।

▬ ओजोन परत को नष्ट करने वाली गैस CFC (Chloro-flore- Carbon) है, जो एयर कंडीशनर, रेफ्रीजरेटर आदि से निकलती है। ओजोन परत में क्षरण CFC में उपस्थित सक्रीय क्लोरीन कारण (C1) कारण होती है।

▬ ओजोन परत की मोटाई नापने में डाबसन इकाई का प्रयोग किया जाता है।

▬ इस मंडल में ऊँचाई के साथ तापमान बढ़ता जाता है, प्रति एक किमी की ऊँचाई पर तापमान में 5°C की वृद्धि होती है।

4. आयन मंडल (lonosphere)

▬ इसकी ऊँचाई 60 किमी से 640 किमी तक होती है। यह भाग कम वायुदाब तथा पराबैंगनी किरणों द्वारा आयनीकृत होता रहता है।

▬ इस मंडल में सबसे नीचे स्थित D-layer से long radio waves एवं E1, E2, और F1, F2 परतों से short radio wave परावर्तित होती है। जिसके फलस्वरूप पृथ्वी पर रेडियो, टेलीविजन, टेलिफोन एवं रडार आदि की सुविधा प्राप्त होती है। संचार उपग्रह इसी मंडल में अवस्थित होते है।

5. बाह्य मंडल (Exosphere)

▬ 640 किमी से ऊपर के भाग को बाह्यमंडल कहा जाता है।

▬ इसकी कोई ऊपरी सीमा निर्धारित नहीं है।

▬ इस मंडल में हाइड्रोजन एवं हीलियम गैस की प्रधानता होती है।

सूर्यातप (Insolation)

▬ सूर्य से पृथ्वी तक पहुँचने वाले सौर विकिरण ऊर्जा को सूर्यातप कहते हैं। यह ऊर्जा लघु तरंगों के रूप में सूर्य से पृथ्वी पर पहुँचती है।

▬ वायुमंडल की बाहरी सीमा पर सूर्य से प्रतिमिनट प्रति वर्ग सेमी० पर 1.94 कैलोरी उष्मा प्राप्त होती है।

▬ किसी भी सतह को प्राप्त होने वाली सूर्यातप की मात्रा एवं उसी सतह से परावर्तित की जाने वाली सूर्यातप की मात्रा के बीच का अनुपात एल्बिो कहलाता है।

▬ वायुमंडल गर्म तथा ठण्डा निम्न विधियों से होता है

1. विकिरण (Radiation): किसी पदार्थ को ऊष्मा तरंगों के संचार द्वारा सीधे गर्म होने को विकिरण कहते हैं। उदाहरणतया, सूर्य से प्राप्त होने वाली किरणों से पृथ्वी तथा उसका वायुमंडल गर्म होते है। यही एकमात्र ऐसी प्रक्रिया है, जिससे ऊष्मा बिना किसी माध्यम के, शून्य से होकर भी यात्रा कर सकती है। सूर्य से आने वाली किरणे लघु तरंगों वाली होती है, जो वायुमंडल को बिना अधिक गर्म किए ही उसे पार करके पृथ्वी तक पहुँच जाती हैं। पृथ्वी पर पहुंची हुई बहुत सी किरणों का बहुत सा भाग पुनः वायुमंडल में चला जाता है। इसे भौमिक विकिरण (Terrestrial radiation) कहते हैं। भौमिक विकिरण अधिक लम्बी तरंगों वाली किरण होती है,  जिसे वायुमंडल सुगमता से अवशोषित कर लेता है। अतः वायुमडल सूर्य से आने वाली सौर विकिरण की अपेक्षा भौमिक विकिरण से अधिक गर्म होता है।

2. संचालन (Conduction): जब असमान ताप वाली दो वस्तुएँ एक-दूसरे के सम्पर्क में आती हैं, तो अधिक तापमान वाली वस्तु से कम तापमान वाली वस्तु की ओर ऊष्मा प्रवाहित होती है। ऊष्मा का यह प्रवाह तब तक चलता रहता है जब तक दोनों वस्तुओं का तापमान एक जैसा न हो जाए। वायु ऊष्मा की कुचालक है, अतः संचालन प्रक्रिया वायुमंडल को गर्म करने के लिए सबसे कम महत्वपूर्ण है। इससे वायुमंडल की केवल निचली परतें ही गर्म होती हैं।

3. संवहन (Convection): किसी गैसीय अथवा तरल पदार्थ के एक भाग से दूसरे भाग की ओर उसके अणुओं द्वारा ऊष्मा के सचार को सवहन कहते हैं। यह संचार गैसीय तथा तरल में इसलिए होता है। क्योकि उनके अणुओं के बीच का सम्बन्ध कमजोर होता है। यह प्रक्रिया ठोस पदार्थों में नहीं होती है।

जब वायुमंडल की निचली परत भौमिक विकिरण अथवा संचालन से गर्म हो जाती है तो उसकी वायु फैलती है जिससे उसका घनत्व कम हो जाता है। घनत्व कम होने से वह हल्की हो जाती है और ऊपर को उठती है। इस प्रकार वह वायु निचली परतों की ऊष्मा को ऊपर ले ती है। ऊपर की ठडी वायु उसका स्थान लेने के लिए नीचे आती है और कुछ देर बाद वह गर्म हो जाती है। इस प्रकार सवहन प्रक्रिया द्वारा वायुमंडल क्रमशः नीचे से ऊपर गर्म होता रहता है। वायुमडल गर्म होने में यह मुख्य भूमिका निभाता है।

4. अभिवहन (Advection): इस प्रक्रिया में ऊष्मा का क्षैतिज दिशा में स्थानान्तरण होता है। गर्म वायु राशियाँ जब ठन्डे इलाको में जाती है, तो उन्हें गर्म कर देती है। इससे ऊष्मा का प्रचार निम्न अक्षाशीय क्षेत्रों से उच्च अक्षाशीय क्षेत्रों तक भी होता है। वायु द्वारा संचालित समुद्री धाराएं भी उष्ण कटिबन्धों से धुवीय क्षेत्रों में ऊष्मा का संचार करती है।

▬ समताप रेखा: वह कल्पित रेखा है. जो समान तापमान वाले स्थानों को मिलाती है। समताप रेखाओं तथा तापमान के वितरण के निम्न लक्षण है

(i) समताप रेखाएँ पूर्व पश्चिम दिशा में अक्षांशों के लगभग समानान्तर खीची जाती है। इसका कारण यह है कि एक ही अक्षांश पर स्थित सभी स्थानों पर एक ही मात्रा में सूर्यातप प्राप्त होता है और तापमान भी लगभग एक जैसा ही होता है।

(ii) जल और स्थान पर तापमान भिन्न होते हैं अतः तटों पर समताप रेखाएँ अकस्मात् मुड जाती है।

(iii) दक्षिणी गोलार्द्ध में जल भाग अधिक है और वहाँ पर तापमान संबंधी विषमताएँ कम पाई जाती है। इसकी विपरीत उत्तरी गोलार्द्ध में जल भाग कम है और वहाँ पर तापमान सम्बन्धी विषमताएँ अधिक पाई जाती हैं। इस कारण दक्षिणी गोलार्द्ध में समताप रेखाओं में मोड़ कम आते हैं और उनकी पूर्व पश्चिम दिशा अधिक स्पष्ट है।

(iv) समताप रेखाओं के बीच की दूरी से ताप प्रवणता (तापमान के बदलने की दर) का अनुमान लगाया जा सकता है। यदि समताप रेखाएँ एक दूसरे के निकट होती हैं, तो ताप-प्रवणता अधिक होती हैं। इसके विपरीत, यदि समताप रेखाएँ एक दूसरे से दूर होती है तो ताप प्रवणता कम होती है।

(v) उष्ण कटिबन्धीय प्रदेशों में तापमान अधिक होता है अतः अधिक मूल्य वाली समताप रेखाएँ उष्ण कटिबन्ध में होती हैं। ध्रुवीय प्रदेशों में तापमान बहुत ही कम होता है अतः वहाँ पर कम मूल्य की समताप रेखाएँ होती हैं।

▬ संसार के अधिकांश क्षेत्रों के लिए जनवरी एवं जुलाई के महीनों में न्यूनतम अथवा अधिकतम तापमान पाया जाता हैं। यही कारण है कि तापमान विश्लेषण के लिए बहुधा इन्हीं दो महीनों को चुना जाता है।

तापान्तर (Range of Temperature): अधिकतम तथा न्यूनतम तापमान के अन्तर को तापान्तर कहते हैं। यह दो प्रकार का होता है

1. दैनिक तापान्तर: किसी स्थान पर किसी एक दिन के अधिकतम तथा न्यूनतम तापमान के अन्तर को वहाँ का दैनिक तापान्तर कहते हैं। ताप में आए इस अंतर को ताप परिसर कहते हैं।

2. वार्षिक तापान्तर: जिस प्रकार दिन तथा रात के तापमान में अन्तर होता है, उसी प्रकार ग्रीष्म तथा शीत ऋतु के तापमान में भी अन्तर होता है। अतः किसी स्थान के सबसे गर्म तथा ठडे महीने के मध्यमान तापमान के अन्तर को वार्षिक तापान्तर कहते हैं। विश्व में सबसे अधिक वार्षिक तापान्तर 65.5°C साईबेरिया में स्थित बरखोयास्क नामक स्थान का है।

▬ किसी भी स्थान विशेष के औसत तापक्रम तथा उसके अक्षांश के औसत तापक्रम के अन्तर को तापीय विसंगति कहते है।

वायुदाब: सामान्य दशाओं में समुद्रतल पर वायुदाब पारे के 76 सेमी० या या 760 मिमी० ऊँचे स्तम्भ द्वारा पड़ने वाला दाब होता है। वायुदाब बैरोमीटर से मापा जाता है दाब को मौसम के पूर्वानुमान के लिए एक महत्त्वपूर्ण सूचक माना जाता है।

▬ वायुमंडलीय दाब की इकाई बार (bar) है (1 bar – 10 N5/m2)।

▬ समदाब रेखा: वह कल्पित रेखा जो समुद्रतल के बराबर घटाए हुए समान वायुदाब वाले स्थानों को मिलाती है, समदाब रेखा (Isobar) कहते है। वायुदाब को मानचित्र पर समदाब रेखा द्वारा दर्शाया जाता है। दूरी की प्रति इकाई पर दाब के घटने को दाब प्रवणता (Pressure Gradient) कहते हैं। जब समदाब रेखा एक-दूसरे पास होती है तो दाब प्रवणता अधिक होती है। परन्तु जब समदाब रेखाएँ एक-दूसरे से दूर होती हैं तो दाब प्रवणता कम होती है।

यंत्र   ————-  आविष्कारक

पारद वायु-दाबमापी   ————-   ई० टॉरीसेली

निद्रव-वायु दाबमापी   ————-   लूसियन विडाई

सेल्सियस थर्मामीटर   ————-   एण्डर्स सेल्सियस

केश आर्द्रतामापी    ————-  डी० सौस्सर

▬ पृथ्वी के धरातल पर चार वायुदाब कटिबंध हैं

1. विषुवत रेखीय निम्न वायुदाब: यह पेटी भूमध्य रेखा से 10° उत्तरी तथा 10° दक्षिणी अक्षांशी के बीच स्थित है। यहाँ सालों भर सूर्य की किरणें लम्बवत् पड़ती है, जिसके कारण तापमान हमेशा ऊँचा रहता है। इस कटिबंध में धरातलीय क्षैतिज पवनें नहीं चलती बल्कि अधिक तापमान के कारण वायु हल्की होकर ऊपर को उठती है और संवहनीय धाराओं का जन्म होता है। इसलिए इस कटिबन्ध को शान्त कटिबन्ध या डोलड्रम कहते हैं।

नोट: विषुवत रेखा पर पृथ्वी के घूर्णन का वेग सबसे अधिक होता है, जिससे यहाँ पर अपकेन्द्रीय बल सर्वाधिक होती है, जो वायु को पृथ्वी के पृष्ठ से परे धकेलती है। इसके कारण भी यहाँ पर वायुदाब कम होता है।

2. उपोष्ण उच्च वायुदाब: उत्तरी तथा दक्षिणी गोलाद्धों में क्रमशः कर्क और मकर रेखाओं से 35° अक्षांशों तक उच्च दाब पेटियाँ पाई जाती है। यहाँ उच्च दाब होने के दो कारण है —

(i) विषुवत रेखीय कटिबन्ध से गर्म होकर उठने वाली वायु ठण्डी और भारी होकर कर्क तथा मकर रेखाओं से 35° अक्षांशों के बीच नीचे उतरती है और उच्च वायुदाब उत्पन्न करती है।

(ii) पृथ्वी के दैनिक गति के कारण उपध्रुवीय क्षेत्रों से वायु विशाल राशियों कर्क तथा मकर रेखाओं से 35° अक्षांशों के बीच एकत्रित हो जाती हैं, जिससे वहाँ पर उच्च वायुदाब उत्पन्न हो जाती है।

नोट: विषुवत रेखा से 30°-35° अक्षांशों के मध्य दोनों गोलार्द्धों में उच्च वायुदाब की पेटियाँ उपस्थित होती हैं। इस उच्च वायुदाब वाली पेटी को अश्व अक्षांश कहते है इसका कारण यह है कि मध्य युग में यूरोप में खेती के लिए पश्चिमी द्वीप समूह में पालदार जल्यानों में लादकर घोड़े भेजे जाते थे। प्रायः इन जलयानों को इन अक्षांसो के बीच वायु शांत रहने के कारण आगे बढ़ने में कठिनाई होती थी। अतः जल्यानों का भार कम के लिए कुछ घोड़े समुद्र में फेंक दिये जाते थे।

3. उपध्रुवीय निम्न वायुदाब: 45° उत्तरी तथा दक्षिणी अक्षांशों से क्रमशः आर्कटिक तथा अंटार्कटिक वृत्तों के बीच निम्न वायु भार की पेटियाँ पाई जाती है। जिसे उपध्रुवीय निम्न दाब पेटियों कहते है।

4. ध्रुवीय उच्च वायुदाय: 80° उत्तरी तथा दक्षिणी अक्षांश से उत्तरी तथा दक्षिणी ध्रुव तक उच्च दाब पेटियों पाई जाती हैं।

पवन (Wind)

▬ पृथ्वी धरातल पर वायुदाब में क्षैतिज विषमताओं के कारण हवा उच्च वायुदाब क्षेत्र से निम्न वायुदाब क्षेत्र की ओर बहती है। क्षैतिज रूप से इस गतिशील हवा को पवन कहते हैं।

▬ ऊध्वानधर दिशा में गतिशील हवा को वायुधारा (Air current) कहते हैं। यदि पृथ्वी स्थिर होती और उसका धरातल समतल होता तो पवन उच्च वायुदाब वाले क्षेत्र से सीधे निम्न वायुदाब वाले क्षेत्र की ओर समदाव रेखाओं पर समकोण बनाती हई चलती है, परन्तु वास्तविक स्थिति यह है कि पृथ्वी अपने अक्ष पर घूर्णन कर रही है और उसका धरातल समतल नहीं है। अतः पवन कई कारणों के प्रभावाधीन अपनी दिशा में परिवर्तन करती हई चलती है। ये कारण हैं. दाव प्रवणता बल, कॉरिआलिस प्रभाव, अभिकेन्द्रीय त्वरण एवं भूघर्षण ।

नोट: कॉरिआलिस प्रभाव (Coriolis Effect):पृथ्वी के घूर्णन के कारण पवनें अपनी मूल दिशा में विक्षेपित हो जाती हैं। इसे कॉरिआलिस बल कहते हैं। इसका नाम फ्रांसीसी वैज्ञानिक के नाम पर पड़ा है जिसने सबसे पहले इस बल के प्रभाव का वर्णन 1835 ई० में किया। इस बल के प्रभावाधीन उत्तरी गोलाद्धं में पवनें दाहिनी ओर तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में अपनी बाई ओर मुड़ जाती हैं। इस विक्षेप को फेरेल नामक वैज्ञानिक ने सिद्ध किया था, अतः इसे फरेल का नियम (Farrel’s Law) कहते हैं। इसे वाइज बलेट नियम द्वारा भी समझा जा सकता है। इस नियम के अनुसार, “यदि कोई व्यक्ति उत्तरी गोलार्द्ध में पवन की ओर पीठ करके खड़ा हो, तो उच्च दाब उसके दाईं ओर तथा निम्न दाब उसके बाई ओर होगा।” दक्षिणी गोलार्द्ध में स्थिति इसके ठीक विपरीत होगी। कॉरिआलिस बल प्रभाव विषुवत रेखा पर शून्य होता है। अर्थात् विषुवत रेखा पर पवनों की दिशा में कोई विक्षेप नहीं होता है। इस बल का अधिकतम प्रभाव ध्रुवों पर होता है। अर्थात ध्रुवों पर पवनों की दिशा में अधिकतम विक्षेप होता है।

▬ पवन निम्न प्रकार के होते हैं – 1. प्रचलित पवन, 2. मौसमी पवन और 3. स्थानीय पवन

1. प्रचलित पवन: पृथ्वी के विस्तृत क्षेत्र पर एक ही दिशा में वर्ष भर चलने वाली पवन को प्रचलित पवन या स्थायी पवन कहते हैं। स्थायी पवने एक वायु-भार कटिबन्ध से दूसरे वायु भार कटिबन्ध की और नियमित रूप से चला करती है। इसके उदाहरण हैं – पछुआ पवन, व्यापारिक पवन और ध्रुवीय पवन।

▬ पछुआ पवन: दोनों गोलार्द्धों में उपोष्ण उच्च वायुदाब कटिबंधों से उपधुवीय निम्न वायुदाब कटिबंधों की ओर चलने वाली स्थायी हवा को, इनकी पश्चिम दिशा के कारण, पछुआ पवन कहा जाता है। पछुआ पवन का सर्वश्रेष्ठ विकास 40° से 65° द० अक्षांशों के मध्य पाया जाता है। यहाँ के इन अक्षांशों को गरजता चालीसा, प्रचण्ड पचासा तथा चीखता साठा कहा जाता है। ये सभी नाम नाविकों के दिए हुए हैं।

▬ व्यापारिक पवन: लगभग 30° उत्तरी और दक्षिणी अक्षांशों के क्षेत्रों या उपोष्ण उच्च वायदाब कटिबंधों से भूमध्य रेखीय निम्न वायुदाब कटिबंधों की ओर दोनो गोलार्द्धों में वर्ष भर निरन्तर प्रवाहित होने वाले पवन को व्यापारिक पवन कहा जाता है। कारिऑलिस बल और फेरल के नियम के कारण उत्तरी गोलार्द्ध में अपनी दायीं ओर तथा दक्षिण गोलार्द्ध में अपनी बायीं ओर विक्षेपित हो जाता है।

▬ ध्रुवीय पवन: ध्रुवीय उच्च वायुदाब की पेटियों से उपध्रुवीय निम्न वायुदाब की पेटियों की ओर प्रवाहित पवन को ध्रुवीय पवन के नाम से जाना जाता है। उत्तरी गोलार्द्ध में इसकी दिशा उत्तर-पूर्व से दक्षिण पश्चिम की ओर तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में दक्षिण-पूर्व से उत्तर-पश्चिम की ओर है।

2. मौसमी पवन : मौसम या समय के परिवर्तन के साथ जिन पवनों की दिशा बदल जाती है उन्हें मौसमी पवन कहा जाता है। जैसे-मौनसूनी पवन, स्थल समीर तथा समुद्री समीर (पवन)।

3. स्थानीय पवन : प्रमुख गर्म स्थानीय पवन ।

▬ चिनक: यह संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा में रॉकी पर्वत-श्रेणी के साथ चलने वाला गर्म या शुष्क पवन है। यह पवन रॉकी पर्वत के पूर्व के पशुपालकों के लिए बडा ही लाभदायक है, क्योंकि शीतकाल की अधिकांश अवधि में यह बर्फ को पिघलाकर चरागाहों को बर्फ से मुक्त रखता है।

▬ फॉन: यह आल्पस पर्वत के उत्तरी ढाल से नीचे उतरने वाली गर्म एवं शुष्क हवा है। इसका सर्वाधिक प्रभाव स्विट्जरलैंड में होता है। इसके प्रभाव से बर्फ पिघल जाती है और पशुचारकों के लिए चरागाह मिल जाता है। इसके प्रभाव से अंगूर जल्दी-पक जाते है।

▬ हरमन: यह सहारा रेगिस्तान से उत्तर पूरब दिशा में चलने वाली गर्म एवं शुष्क हवा है। यह पवन सहारा से गिनी तट की ओर बहती है। गिनी तट पर इसे डॉक्टर हवा कहा जाता है।

▬ सिरॉको: यह सहारा मरुस्थल से भूमध्य सागर की ओर बहने वाली गर्म हवा है। जब यह भूमध्य सागर पार करती है तो आद्र हो जाती है और इटली पहुँच जाती है। इसके अन्य स्थानीय नाम भी हैं, जैसे—(1) खमसिन (मिस्र में). (ii) गिबिली (लीबिया में), (iii) चिली (ट्यूनिशिया में), (iv) लेस्ट (मैड्रिया में), (v) सिरॉको (इटली में) और (vi) लेबेक (स्पेन में)।

▬ सिमूम : यह अरब रेगिस्तान में बहने वाली गर्म एवं शुष्क हवा है।

लेक रोलर : यह उत्तरी अमेरिका के विशाल मैदान में दक्षिणी पश्चिमी या उत्तरी पश्चिमी तेज धूल भरी चलने वाली आँधी है।

ब्रिक फील्डर : यह आस्ट्रेलिया के विक्टोरिया प्रांत में चलने वाली गर्म एवं शुष्क हवा है।

▬ नारवेस्टर : यह न्यूजीलैंड में उच्च पर्वतों से उतरने वाली गर्म एवं शुष्क हवा है।

▬ शामल : यह इराक तथा फारस की खाड़ी में चलने वाली गर्म एवं शुष्क हवा है।

▬ साण्टा आना : यह दक्षिणी कैलीफोर्निया में साण्टा आना घाटी से चलने वाली गर्म एवं शुष्क धूल भरी आँधी है।

▬ कोयमबंग: यह जावा इण्डोनेशिया में बहने वाली गर्म हवा है। यह तम्बाकू की खेती को काफी नुकसान पहुँचाती है।

कुछ अन्य गर्म हवाएँ एवं स्थान

नाम  ——————–  स्थान

ट्रैमोण्टेन   ————-  मध्य यूरोप

अयाला   ————-  फ्रांस

वर्गस   ————-  द. अफ्रीका

सुखोवे   ————-  रूस एवं कजाखस्तान

बाग्यो   ————-  फिलीपींस द्वीप समूह

गारिच   ————-  द० पूर्वी ईरान

लू   ————-  उ० भारत

सोलैनो   ————-  द० पूर्वी स्पेन

सामून   ————-   ईरान

स्थानीय शीतल हवाएँ

नाम  ———————-  स्थान

विलीवाव   ————-  अलास्का

बोरा   ————-  एड्रियाटिक तट

मिस्ट्रल   ————-  स्पेन एवं फ्रांस

बुरान   ————-  रूस

बाइज   ————-  द० फ्रांस

पैम्पीरो   ————-  अर्जेण्टीना

फ्रियाजेम   ————-  ब्राजील

नार्दर   ————-  सं०रा० अमेरिका

नॉर्टी   ————-  सं०रा० अमेरिका

पोनेण्टी   ————-  द. अफ्रीका

पैपागायो   ————-  मैक्सिको

मैस्ट्रेल   ————-  उ० इटली

नेवाडॉस   ————-  इक्वेडोर

विली-विली   ————-  आस्ट्रेलिया

सीस्टान   ————-  पूर्वी ईरान

हबूब   ————-  सूडान

पुर्गा   ————-  टूण्डा प्रदेश

केप डॉक्टर *   ————-  द. अफ्रीकी गणतंत्र

(* इसे टेबुल ब्लॉक कहते हैं)

▬ जेट-प्रवाह (Jet Streams) : क्षोभमंडल की ऊपरी परत में बहुत तीव्र गति से वाले सँकरे, नलिकाकार एवं विस्प्री पवन-प्रवाह को जेट-प्रवाह कहते हैं। यह 6 से 12 किमी की ऊँचाई पर पश्चिम प्रवाहित होता है। यह दोनों गोलार्द्धों में पाया जाता है. परतु उत्तरी गोलार्द्ध में यह बहुत शक्तिशाली होता है। इसमें वायु 120 किमी प्रति घंटा से चलती है। जेट-प्रवाल वायुमंडलीय विक्षोभों, चक्रवातों, प्रतिचक्रवातों तूफानों और वर्षा को उत्पन्न करने में सहायक होते है| आधुनिक खोजों के अनुसार एशिया में मानसून पवनों के कारण जेट-प्रवाल माना जाता है | यह पृथ्वी पर तापमान के वितरण का संतुलन बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

▬ वायु राशियों (Air Masses): वायुमंडल का वह विशाल एवं विस्तृत भाग जिसमें तापमान तथा आर्द्रता के भौतिक लक्षण क्षैतिज दिशा में समरूप हों, वायु राशि कहलाता है। सामान्यतः वायुराशियाँ सैकड़ों किलोमीटर तक विस्तृत होती हैं। एक वायु राशि में कई परतें होती है, जो एक-दूसरे के ऊपर क्षैतिज दिशा में फैली होती हैं। प्रत्येक परत में वायु के तापमान तथा आद्रता की स्थिति लगभग समान होती है। यह जलवायु तथा मौसम क अध्ययन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

▬ वाताग्र (Fronts): दो विभिन्न प्रकार की वायु-राशियाँ सुगमता से आपस में मिश्रित नहीं होती और तापमान तथा आर्द्रता सम्बन्धी अपना अस्तित्व बनाए रखने के प्रयास करती है। इस प्रकार दो विभिन्न वायु-राशियाँ एक सीमातल द्वारा अलग रहती हैं। इस सीमातल को ही वाताग्र (Fronts) कहते हैं। जब गर्म वायु हल्की होने के कारण ठण्डी तथा भारी वायु के ऊपर चढ़ जाती है तो उसे उष्ण वाताग्र तथा जब ठण्डी तथा भारी वायु उष्ण तथा हल्का वायु राशि के विरुद्ध आगे बढ़ती है तो उसे ऊपर की ओर उठा देती है तो इसे शीत वाताग्र कहते हैं।

▬ आद्रता (Humidity): वायुमंडल में उपस्थित जलवाष्य को वायुमंडल की आद्रता कहते है।

यह तीन प्रकार की होती है

(i) निरपेक्ष आर्द्रता (Absolute Humidity): वायु की प्रति इकाई आयतन में विद्यमान जलवाष्म की मात्रा को निरपेक्ष आर्द्रता कहते हैं। इसे ग्राम प्रति घन मीटर में व्यक्त किया जाता है।

(ii) विशिष्ट आर्द्रता (Specific Humidity): वायु के प्रति इकाई भार में जलवाष्प के भार को विशिष्ट आईता कहते हैं। इसे ग्राम प्रति किग्रा० की इकाई में मापा जाता है।

(iii) सापेक्षा आर्द्रता (Relative Humidity): किसी भी तापमान पर वायु में उपस्थित जलवाष्प तथा उसी तापमान पर उसी वायु की जलवायु धारण करने की क्षमता के अनुपात को सापेक्ष आर्द्रता कहते हैं। इसे निम्न सूत्र द्वारा भी व्यक्त कर सकते हैं

सापेक्ष आर्द्रता = किसी ताप पर वायु में उपस्थित जलवाष्प की मात्रा × 100 / उसी ताप पर उसी
वायु की जलवाष्प शोषण करने की क्षमता

▬ सापेक्ष आर्द्रता जलवाष्ण की मात्रा एवं वायु के तापमान पर निर्भर करता है। इसे प्रतिशत में व्यक्त किया जाता है। वायु में जलवाष्प की मात्रा अधिक होने पर सापेक्ष आर्द्रता अधिक होती है। वायु का तापमान कम होने पर सापेक्ष आर्द्रता बढ़ जाती है एवं तापमान बढ़ जाने पर सापेक्ष आर्द्रता कम हो जाती है।

▬ संतृप्त वायु की सापेक्ष आर्द्रता 100% होती है।

▬ संघनन (Condensation): जल की गैसीय अवस्था के तरल या ठोस अवस्था में परिवर्तित होने की क्रिया को संघनन कहते हैं। यह दो कारकों पर निर्भर करता है-(i) तापमान में कमी पर तथा (ii) वायु की सापेक्ष आर्द्रता पर।

▬ ओसांक (Dewpoint): वायु के जिस तापमान पर जल अपनी गैसीय अवस्था से तरल या ठोस अवस्था में परिवर्तित होता है, उसे ओसांक कहते हैं। ओसांक पर वायु संतृप्त हो जाती है और उसकी सापेक्ष आर्द्रता 100% होती है।

▬ ओस पड़ने के लिए औसांक का हिमांक (0°C) से ऊपर होना चाहिए।

▬ पाला या तुषार (Frost): जब ओसांक, हिमांक से नीचे होता है तब ओस के स्थान पर पाला पड़ता है। दूसरे शब्दों में, जमी हुई ओस को ही पाला कहते हैं।

▬ कोहरा (Fog): वायुमंडल की निचली परतों में एकत्रित धूल कण, धुएँ के रज एवं संघनित जल-पिण्डों को कोहरा कहते हैं। ओसांक से नीचे वायु का तापमान कम होने पर कोहरे का निर्माण होता है। इसमें दृश्यता एक किमी से कम होती है।

▬ धुन्ध (Mist): हल्के-फुल्के कोहरे को कुहासा या धुन्ध कहते हैं। इसमें दृश्यता एक किमी से अधिक किन्तु दो किमी से कम होती है।

▬ बादल (Clouds): बादल मुख्यतः हवा के रुद्धोष्म (Adiabatic) प्रक्रिया द्वारा ठंडे होने पर उसके तापमान के ओसांक से नीचे गिरने से बनते है। यह अल्प घनत्व के कारण वायुमंडल में तैरते हैं। रूप के आधार पर बादल निम्न प्रकार के होते हैं

(i) पक्षाभ बादल : ये हिम के कणों से बने ऊँचे, सफेद और पतले बादल होते हैं।

(ii) कपासी बादल : इनका आकार समतल एवं शीर्ष गुम्बदनुमा होता है।

(iii) स्तरी बादल : ये परतदार चादर जैसे लगते हैं। वे अधिकांश या पूर्ण आकाश को ढ़के रहते हैं। ये दो या तीन किमी की ऊँचाई पर पाए जाते हैं।

▬ वर्षा (Rainfall): जब जलवाष्प की बूंदे जल के रूप में पृथ्वी पर गिरती है, तो उसे वर्षा कहते हैं। वायु के ठण्डा होने की विधियों के अनुसार वर्षा तीन प्रकार की होती है

(i) संवहनीय वर्षा (Convectional Rainfall):जब भूतल बहुत गर्म हो जाता है, तो उसके साथ लगने वाली वायु भी गर्म हो जाती है। वायु गर्म होकर फैलती है और हल्की हो जाती है। यह हल्की वायु ऊपर को उठने लगती है और संवहनीय धाराओं का निर्माण होता है। ऊपर जाकर यह वायु ठण्डी हो जाती है और इसमें उपस्थित जलवाष्ण का संघनन होने लगता है। संघनन से कपासी मेघ बनते हैं, जिससे घनघोर वर्षा होती है। इसे संवहनीय वर्ष कहते हैं।

(ii) पर्वतकृत वर्षा (Orographic Rainfall): जब जलवाष्ण से लदी हुई गर्म वायु को किसी पर्वत या पठार की ढलान के साथ ऊपर चढ़ना पड़ता है, तो यह वायु ठण्डी हो जाती है। ठण्डी होने से यह संतृप्त हो जाती है और ऊपर चढ़ने से जलवाष्प का संघनन होने लगता है। इससे वर्षा होती है। इसे पर्वतकृत वर्षा कहते हैं।

(iii) चक्रवाती वर्षा (Cyclonic or Frontal Rainfall) : चक्रवातों द्वारा होने वाली वर्षा को चक्रवाती अथवा वाताग्री वर्षा कहते हैं।

चक्रवात, प्रतिचक्रवात

▬ चक्रवात, प्रतिचक्रवात इसकी उत्पत्ति विभिन्न प्रकार की वायुराशियों के मिश्रण के फलस्वरूप वायु की तीव्र गति से ऊपर उठकर बवंडर का रूप ग्रहण करने से होती है।

▬ चक्रवात : केन्द्र में कम दाब की स्थापना होने पर बाहर की ओर दाब बढ़ता जाता है। इस अवस्था में हवाएँ बाहर से भीतर की ओर चलती है, इसे ही ‘चक्रवात’ कहा जाता है। चक्रवात में वायु चलने की दिशा उत्तरी गोलार्द्ध में घड़ी की सूइयों के विपरीत (Anti clockwise) एवं दक्षिणी गोलार्द्ध में घड़ी की सूई दिशा (Clockwise) में होती है । टारनेडो. हरीकेन्स व टाइफून चक्रवात के उदाहरण हैं।

▬ प्रति-चक्रवात: जब केन्द्र में दाब अधिक होता है तो केन्द्र से हवाएँ बाहर की ओर चलती है. इसे प्रति-चक्रवात कहा जाता है। इसमें वाताग्र (Fronts) का अभाव होता है।

▬ प्रति चक्रवात में वायु की दिशा उत्तरी गोलार्द्ध में घड़ी की सूइयों के अनुकूल (Clockwise) तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में घड़ी की सूइयों के विपरीत (Anti-clockwise) होती है।

▬ चक्रवात में हवा केन्द्र की तरफ आती है और ऊपर उठकर ठंडी होती है और वर्षा कराती है, जबकि प्रति चक्रवात में मौसम साफ होता है।

▬ टारनेडो : यह भयंकर अल्पकालीन तूफान है। आस्ट्रेलिया एवं संयुक्त राज्य अमेरिका के मिसीसिपी इलाकों में इस तूफान को ‘टारनेडो’ कहा जाता है। वह जल एवं स्थल दोनों में उत्पन्न होता है। इसमें स्थलीय हवाओं का वेग 325 किमी/घंटा होता है।

▬ हरीकेन्स : अटलांटिक महासागर में उठने वाली तथा पश्चिमी.द्वीप समूह के चारों ओर चलने वाली भयंकर चक्रवाती तूफान है। इसकी गति 121 किमी/घंटा होती है।

▬ टाइफून : प्रशांत महासागर में उठने वाली तथा चीन सागर में चलने वाली वक्रगामी कटिबन्धी चक्रवात को टाइफून कहते हैं। इसकी गति 160 किमी/घंटा होती है।







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